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वन पर्व
अध्याय १०७
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लोमश उवाच
ततस्तेन समागम्य कालय़ोगेन केनचित् |  २५   क
अगृह्णाच्च वरं तस्माद्गङ्गाय़ा धारणं नृप |  २५   ख
स्वर्गवासं समुद्दिश्य पितॄणां स नरोत्तमः ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति