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वन पर्व
अध्याय १०७
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लोमश उवाच
शृङ्गैर्वहुविधाकारैर्धातुमद्भिरलङ्कृतम् |  ५   क
पवनालम्विभिर्मेघैः परिष्वक्तं समन्ततः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति