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उद्योग पर्व
अध्याय १०७
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सुपर्ण उवाच
अत्र निर्याणकालेषु तमः सम्प्राप्यते महत् |  २०   क
अभेद्यं भास्करेणापि स्वय़ं वा कृष्णवर्त्मना ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति