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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
ते कार्तय़ुगधर्माणो भागाः परमसत्कृताः |  ५०   क
प्रापुरादित्यवर्णं तं पुरुषं तमसः परम् |  ५०   ख
वृहन्तं सर्वगं देवमीशानं वरदं प्रभुम् ||  ५०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति