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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ |  ११९   क
सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिरलङ्कृतौ ||  ११९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति