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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
तथा कुरुत कौरव्या यथा वः सात्यको युधि |  १५   क
न जीवन्प्रतिनिर्याति महतोऽस्माद्रथव्रजात् |  १५   ख
अस्मिन्हते हतं मन्ये पाण्डवानां महद्वलम् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति