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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
सुदक्षिणस्तु समरे कार्ष्णिं विव्याध पञ्चभिः |  १९   क
सारथिं चास्य नवभिरिच्छन्भीष्मस्य जीवितम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति