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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
द्रुपदश्च त्रिभिर्वाणैर्विव्याध निशितैस्तथा |  २४   क
गुरुपुत्रं समासाद्य भीष्मस्य पुरतः स्थितम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति