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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
अश्वत्थामा ततस्तौ तु विव्याध दशभिः शरैः |  २५   क
विराटद्रुपदौ वृद्धौ भीष्मं प्रति समुद्यतौ ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति