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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
सहदेवं तथा यान्तं कृपः शारद्वतोऽभ्ययात् |  २७   क
यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमुपाद्रवत् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति