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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
कृपश्च समरे राजन्माद्रीपुत्रं महारथम् |  २८   क
आजघान शरैस्तूर्णं सप्तत्या रुक्मभूषणैः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति