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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
नकुलं तु रणे क्रुद्धं विकर्णः शत्रुतापनः |  ३२   क
विव्याध साय़कैः षष्ट्या रक्षन्भीष्मस्य जीवितम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति