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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं रणे यान्तं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् |  ३८   क
हार्दिक्यो वारय़ामास रक्षन्भीष्मस्य जीवितम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति