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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ः शरसङ्घं तु प्रेषय़ामास संय़ुगे |  ४   क
राक्षसाय़ सुसङ्क्रुद्धो माधवः परवीरहा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति