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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
तथैव पार्षतो राजन्हार्दिक्यं नवभिः शरैः |  ४०   क
विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति