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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
तौ शरान्सूर्यसङ्काशान्कर्मारपरिमार्जितान् |  ४५   क
अन्योन्यस्य रणे क्रुद्धौ चिक्षिपाते मुहुर्मुहुः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति