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भीष्म पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनोऽपि परय़ा शक्त्या पार्थमवारय़त् |  ५४   क
कथं भीष्मं परो हन्यादिति निश्चित्य भारत ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति