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द्रोण पर्व
अध्याय १०७
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धृतराष्ट्र उवाच
यस्मिञ्जय़ाशा सततं पुत्राणां मम सञ्जय़ |  १   क
तं दृष्ट्वा विमुखं सङ्ख्ये किं नु दुर्योधनोऽव्रवीत् |  १   ख
कर्णो वा समरे तात किमकार्षीदतः परम् ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति