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द्रोण पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
यच्चापि तान्प्रव्रजतः कृष्णाजिननिवासिनः |  १४   क
परुषाण्युक्तवान्कर्णः सभाय़ां संनिधौ तव ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति