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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा वृक्षादीनण्डजान्पशून् |  २८   क
मनुष्यास्तन्वते यज्ञांस्ते स्वर्गं प्राप्नुवन्ति च ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति