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द्रोण पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
भीमसेनं रणे दृष्ट्वा ज्वलन्तमिव पावकम् |  २   क
रथमन्यं समास्थाय़ विधिवत्कल्पितं पुनः |  २   ख
अभ्ययात्पाण्डवं कर्णो वातोद्धूत इवार्णवः ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति