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द्रोण पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रध्माप्य जलजं भेरीशतनिनादितम् |  २३   क
अक्षुभ्यत वलं हर्षादुद्धूत इव सागरः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति