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द्रोण पर्व
अध्याय १०७
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सञ्जय़ उवाच
सुवर्णविकृतान्वाणान्प्रमुञ्चन्तावरिन्दमौ |  ३४   क
भास्वरं व्योम चक्राते वह्न्युल्काभिरिव प्रभो ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति