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वन पर्व
अध्याय २७०
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मार्कण्डेय़ उवाच
तं दृष्ट्वावस्थितं सङ्ख्ये हरय़ः पवनात्मजम् |  ८   क
वेगेन महता राजन्संन्यवर्तन्त सर्वशः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति