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शान्ति पर्व
अध्याय १०८
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भीष्म उवाच
अर्था ह्येवाधिगम्यन्ते सङ्घातवलपौरुषात् |  १५   क
वाह्याश्च मैत्रीं कुर्वन्ति तेषु सङ्घातवृत्तिषु ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति