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शान्ति पर्व
अध्याय १०८
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भीष्म उवाच
पुत्रान्भ्रातॄन्निगृह्णन्तो विनय़े च सदा रताः |  १८   क
विनीतांश्च प्रगृह्णन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति