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शान्ति पर्व
अध्याय ५१
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वासुदेव उवाच
भवांस्तु मम भक्तश्च नित्यं चार्जवमास्थितः |  १२   क
दमे तपसि सत्ये च दाने च निरतः शुचिः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति