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शान्ति पर्व
अध्याय १९७
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मनुरु उवाच
विषय़ा विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः |  १६   क
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति