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शान्ति पर्व
अध्याय १६२
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भीष्म उवाच
विरक्ताश्च न रुष्यन्ति मनसाप्यर्थकोविदाः |  २१   क
आत्मानं पीडय़ित्वापि सुहृत्कार्यपराय़णाः |  २१   ख
न विरज्यन्ति मित्रेभ्यो वासो रक्तमिवाविकम् ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति