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अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
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भीष्म उवाच
ज्येष्ठवत्तात वर्तस्व ज्येष्ठो हि सततं भवान् |  २   क
गुरोर्गरीय़सी वृत्तिर्या चेच्छिष्यस्य भारत ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति