वन पर्व  अध्याय २६०

मार्कण्डेय़ उवाच

पितामहवचः श्रुत्वा गन्धर्वी दुन्दुभी ततः |  १०   क
मन्थरा मानुषे लोके कुव्जा समभवत्तदा ||  १०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति