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वन पर्व
अध्याय २४७
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देवदूत उवाच
महर्षेऽकार्यवुद्धिस्त्वं यः स्वर्गसुखमुत्तमम् |  १   क
सम्प्राप्तं वहु मन्तव्यं विमृशस्यवुधो यथा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति