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शान्ति पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
समीक्षते तु योऽर्थं वै कामं स्वर्गं च भारत |  १२   क
अय़ं पन्था महर्षीणामिय़ं लोकविदां गतिः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति