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उद्योग पर्व
अध्याय १०८
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सुपर्ण उवाच
अत्र वाय़ुस्तथा वह्निरापः खं चैव गालव |  १४   क
आह्निकं चैव नैशं च दुःखस्पर्शं विमुञ्चति |  १४   ख
अतः प्रभृति सूर्यस्य तिर्यगावर्तते गतिः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति