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उद्योग पर्व
अध्याय १०८
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सुपर्ण उवाच
अत्र नित्यं स्रवन्तीनां प्रभवः सागरोदय़ः |  १६   क
अत्र लोकत्रय़स्यापस्तिष्ठन्ति वरुणाश्रय़ाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति