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उद्योग पर्व
अध्याय १०८
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सुपर्ण उवाच
अतो रात्रिश्च निद्रा च निर्गता दिवसक्षय़े |  ७   क
जाय़ते जीवलोकस्य हर्तुमर्धमिवाय़ुषः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति