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उद्योग पर्व
अध्याय १०८
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सुपर्ण उवाच
अत्र मूलं हिमवतो मन्दरं याति शाश्वतम् |  ९   क
अपि वर्षसहस्रेण न चास्यान्तोऽधिगम्यते ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति