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भीष्म पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
सेनय़ोरुभय़ोश्चैव समन्ताच्छ्रूय़ते महान् |  १४   क
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषो गाण्डीवस्य च निस्वनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति