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भीष्म पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
तं चैव निकृतिप्रज्ञं पाञ्चाल्यं पापचेतसम् |  १७   क
पुरस्कृत्य रणे पार्थो भीष्मस्याय़ोधनं गतः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति