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भीष्म पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
नाय़ं संरक्षितुं कालः प्राणान्पुत्रोपजीविभिः |  २८   क
याहि स्वर्गं पुरस्कृत्य यशसे विजय़ाय़ च ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति