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भीष्म पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
व्रह्मण्यता दमो दानं तपश्च चरितं महत् |  ३०   क
इहैव दृश्यते राज्ञो भ्राता यस्य धनञ्जय़ः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति