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भीष्म पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
को हि नेच्छेत्प्रिय़ं पुत्रं जीवन्तं शाश्वतीः समाः |  ४०   क
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य ततस्त्वा विनिय़ुज्महे ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति