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भीष्म पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
उत्पतन्ति हि मे वाणा धनुः प्रस्फुरतीव मे |  ५   क
योगमस्त्राणि गच्छन्ति क्रूरे मे वर्तते मतिः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति