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वन पर्व
अध्याय २००
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व्याध उवाच
स चेन्निवृत्तवन्धस्तु विशुद्धश्चापि कर्मभिः |  ३८   क
प्राप्नोति सुकृताँल्लोकान्यत्र गत्वा न शोचति ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति