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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
तं लोकसाक्षिणमजं पुरुषं; रविवर्णमीश्वरगतिं वहुशः |  १६   क
प्रणमध्वमेकमतय़ो यतय़ः; सलिलोद्भवोऽपि तमृषिं प्रणतः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति