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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
तौ वृषाविव नर्दन्तौ वलिनौ वाशितान्तरे |  २८   क
शार्दूलाविव चान्योन्यमत्यर्थं च ह्यगर्जताम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति