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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यं प्रजिहीर्षन्तावन्योन्यस्यान्तरैषिणौ |  २९   क
अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ गोष्ठेष्विव महर्षभौ ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति