द्रोण पर्व  अध्याय १०८

धृतराष्ट्र उवाच

स कथं पाण्डवं युद्धे भ्राजमानमिव श्रिय़ा |  ३   क
नातरत्संय़ुगे तात तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||  ३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति