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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ शिरश्छिन्धि सैन्धवस्य दुरात्मनः |  १६   क
अस्तं महीधरश्रेष्ठं यिय़ासति दिवाकरः |  १६   ख
शृणुष्वैव च मे वाक्यं जय़द्रथवधं प्रति ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति