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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
प्रहसन्तौ तथान्योन्यं भर्त्सय़न्तौ मुहुर्मुहुः |  ३२   क
शङ्खशव्दं च कुर्वाणौ युय़ुधाते परस्परम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति